
राष्ट्रीय शिक्षक संघ द्वारा आयोजित **कर्तव्य बोध पखवाड़ा** का उद्देश्य समाज में कर्तव्य, अनुशासन और नैतिक मूल्यों के प्रति जागरूकता उत्पन्न करना है। यह पखवाड़ा विशेष रूप से विद्यार्थियों, शिक्षकों और अभिभावकों में यह भावना विकसित करता है कि अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना भी उतना ही आवश्यक है।
इस पखवाड़े के अंतर्गत विद्यालयों एवं शैक्षणिक संस्थानों में विविध रचनात्मक एवं प्रेरणादायी गतिविधियाँ आयोजित की जाती हैं, जैसे— कर्तव्य बोध पर संगोष्ठी, राष्ट्र निर्माण में शिक्षक की भूमिका पर चर्चा, स्वच्छता अभियान, पर्यावरण संरक्षण कार्यक्रम, शपथ समारोह, निबंध व भाषण प्रतियोगिताएँ आदि। इन गतिविधियों के माध्यम से विद्यार्थियों में राष्ट्रप्रेम, सामाजिक उत्तरदायित्व और नागरिक चेतना का विकास किया जाता है।
राष्ट्रीय शिक्षक संघ का मानना है कि शिक्षक समाज का मार्गदर्शक होता है। जब शिक्षक स्वयं कर्तव्यनिष्ठ होकर कार्य करता है, तो वही संस्कार विद्यार्थियों में भी विकसित होते हैं। कर्तव्य बोध पखवाड़ा इसी विचार को सशक्त करता है और एक जागरूक, अनुशासित एवं मूल्यनिष्ठ समाज के निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
राष्ट्रीय शिक्षक संघ के द्वारा कर्तव्य बोध पखवाड़ा कब मनाया जाता है
राष्ट्रीय शिक्षक संघ (और उससे जुड़े शिक्षण संगठनों/शिक्षक संघों) द्वारा कर्तव्य बोध पखवाड़ा आम तौर पर जनवरी महीने में आयोजित किया जाता है। उदाहरण के हिसाब से कुछ शिक्षक संघों द्वारा यह पखवाड़ा स्वामी विवेकानंद जी की जयंती से शुरू होकर सुभाषचंद्र बोस की जयंती तक मनाया जाता है, यानी लगभग 12 जनवरी से 23 जनवरी तक।
12 जनवरी – स्वामी विवेकानंद जयंती (राष्ट्रीय युवा दिवस)
12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद जयंती पूरे देश में श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाई जाती है। इसी दिन को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। स्वामी विवेकानंद जी भारत के महान संत, विचारक और युवाओं के प्रेरणास्रोत थे। उन्होंने अपने विचारों और संदेशों से भारत को विश्व पटल पर गौरवान्वित किया।
स्वामी विवेकानंद जी का जीवन आत्मविश्वास, कर्तव्य बोध, राष्ट्रप्रेम और सेवा भावना का प्रतीक है। उनका प्रसिद्ध संदेश— “उठो, जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए”— आज भी युवाओं को जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
इस दिन विद्यालयों, महाविद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं में भाषण, संगोष्ठी, युवा संवाद, सेवा कार्य और प्रेरक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य युवाओं में नैतिक मूल्यों, अनुशासन और राष्ट्र निर्माण के प्रति जागरूकता उत्पन्न करना होता है।
स्वामी विवेकानंद : जीवन परिचय
स्वामी विवेकानंद भारत के महान संत, विचारक, दार्शनिक और राष्ट्रप्रेमी थे। उनका जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता (पश्चिम बंगाल) में हुआ। उनका बचपन का नाम *नरेन्द्रनाथ दत्त* था। उनके पिता *विश्वनाथ दत्त* एक प्रसिद्ध वकील थे और माता *भुवनेश्वरी देवी* धार्मिक एवं संस्कारवान महिला थीं। नरेन्द्रनाथ बचपन से ही अत्यंत बुद्धिमान, साहसी और जिज्ञासु थे। उन्होंने **प्रेसीडेंसी कॉलेज, कोलकाता** से शिक्षा प्राप्त की। सत्य और ईश्वर की खोज ने उन्हें महान संत **श्रीरामकृष्ण परमहंस** का शिष्य बना दिया। गुरु के सान्निध्य में रहकर उन्होंने भारतीय दर्शन, वेदांत और मानव सेवा के महत्व को गहराई से समझा।सन1893 में स्वामी विवेकानंद ने **शिकागो (अमेरिका) में विश्व धर्म संसद** में ऐतिहासिक भाषण दिया, जिसकी शुरुआत उन्होंने “*मेरे अमेरिकी भाइयों और बहनों*” शब्दों से की। इस भाषण ने पूरी दुनिया में भारत की आध्यात्मिक महानता का परिचय कराया।
स्वामी विवेकानंद ने 1897 में रामकृष्ण मिशन** की स्थापना की, जिसका उद्देश्य शिक्षा, सेवा और मानव कल्याण था। वे युवाओं को आत्मविश्वास, चरित्र निर्माण और राष्ट्रसेवा का संदेश देते थे।4 जुलाई 1902 को मात्र 39 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। उनका जीवन आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनका संदेश था— *“उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक रुको मत।
स्वामी विवेकानंद और कर्तव्य बोध पखवाड़ा
स्वामी विवेकानंद का संपूर्ण जीवन कर्तव्य बोध, आत्मअनुशासन और सेवा भावना का जीवंत उदाहरण है। वे मानते थे कि मानव जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल व्यक्तिगत उन्नति नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन करना है। उनके विचार कर्तव्य बोध पखवाड़ा के मूल उद्देश्य से पूर्णतः मेल खाते हैं।
स्वामी विवेकानंद ने युवाओं को सदा यह संदेश दिया कि वे अपने भीतर छिपी शक्ति को पहचानें और उसे राष्ट्र निर्माण तथा मानव सेवा में लगाएँ। उनका प्रसिद्ध कथन— “उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक रुको मत”— कर्तव्य के प्रति निरंतर जागरूक रहने की प्रेरणा देता है।
कर्तव्य बोध पखवाड़ा के माध्यम से विद्यार्थियों और नागरिकों में जिन मूल्यों को विकसित करने का प्रयास किया जाता है— जैसे अनुशासन, परिश्रम, स्वावलंबन, समाज सेवा और राष्ट्रप्रेम— वे सभी स्वामी विवेकानंद के विचारों की ही प्रतिध्वनि हैं। वे कहते थे कि सच्चा धर्म वही है जो मानव सेवा और कर्तव्य पालन सिखाए।
इस प्रकार कर्तव्य बोध पखवाड़ा स्वामी विवेकानंद के आदर्शों को जीवन में उतारने का एक सशक्त माध्यम है। उनके विचारों को अपनाकर ही हम कर्तव्यनिष्ठ, चरित्रवान और जागरूक नागरिक बन सकते हैं और एक सशक्त भारत के निर्माण में अपना योगदान दे सकते हैं।
“शिक्षा का असली उद्देश्य ऐसा ज्ञान देना है जो व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाए और समाज के प्रति उत्तरदायी बनाए।” — स्वामी विवेकानंद
यह कथन शिक्षा के वास्तविक अर्थ को स्पष्ट करता है। शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान या परीक्षा में अंक प्राप्त करने का साधन नहीं है, बल्कि यह जीवन को सही दिशा देने वाला संस्कार है। सच्ची शिक्षा वही है जो व्यक्ति को अपने पैरों पर खड़ा होने की क्षमता दे, उसमें आत्मविश्वास जगाए और उसे परिश्रमी बनाए।
आत्मनिर्भर व्यक्ति न केवल अपना जीवन सफल बनाता है, बल्कि समाज और राष्ट्र की उन्नति में भी योगदान देता है। वहीं, समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना व्यक्ति को अपने कर्तव्यों का बोध कराती है— जैसे ईमानदारी, सहयोग, सेवा, अनुशासन और सामाजिक सद्भाव।
इस प्रकार शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार पाना नहीं, बल्कि अच्छा इंसान और जागरूक नागरिक बनाना है। जब शिक्षा आत्मनिर्भरता और सामाजिक उत्तरदायित्व दोनों का विकास करती है, तभी एक सशक्त, नैतिक और समृद्ध समाज का निर्माण संभव होता है।
“शिक्षा केवल बुद्धिमत्ता नहीं, बल्कि एक ऐसा साधन है जो व्यक्ति को अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक करता है।”
यह कथन शिक्षा के व्यापक और वास्तविक उद्देश्य को दर्शाता है। शिक्षा का कार्य केवल ज्ञान देना या बौद्धिक विकास करना ही नहीं है, बल्कि व्यक्ति में सही-गलत की समझ, सामाजिक चेतना और नैतिक जिम्मेदारी का विकास करना भी है।
सच्ची शिक्षा व्यक्ति को उसके अधिकारों की जानकारी देती है, ताकि वह सम्मान और आत्मविश्वास के साथ जीवन जी सके, साथ ही उसे अपने कर्तव्यों का बोध कराती है, जिससे वह समाज, राष्ट्र और मानवता के प्रति उत्तरदायी बने।
इस प्रकार शिक्षा एक ऐसा माध्यम है जो व्यक्ति को जागरूक नागरिक, कर्तव्यनिष्ठ इंसान और समाज का उपयोगी सदस्य बनाती है।
23 जनवरी – सुभाष चंद्र बोस जयंती (पराक्रम दिवस)
23 जनवरी को भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती मनाई जाती है। इस दिन को पराक्रम दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस साहस, त्याग, देशभक्ति और कर्तव्यनिष्ठा के प्रतीक थे।
सुभाष चंद्र बोस का जीवन राष्ट्र के लिए समर्पण का अनुपम उदाहरण है। उनका प्रसिद्ध नारा— “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा”— भारतीय जनमानस में आज भी देशभक्ति की अलख जगाता है। उन्होंने आजाद हिंद फौज का गठन कर स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी।
इस दिन देशभर में विद्यालयों, महाविद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं में भाषण, संगोष्ठी, देशभक्ति कार्यक्रम और श्रद्धांजलि समारोह आयोजित किए जाते हैं। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य युवाओं में राष्ट्रप्रेम, साहस और कर्तव्य बोध की भावना को सुदृढ़ करना है। सुभाष चंद्र बोस जयंती हमें यह संदेश देती है कि देश की स्वतंत्रता और प्रगति के लिए त्याग, संघर्ष और पराक्रम आवश्यक है। उनके आदर्श आज भी हर भारतीय को राष्ट्र सेवा के लिए प्रेरित करते हैं।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस : जीवन परिचय
नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी, प्रखर राष्ट्रवादी नेता और आज़ाद हिंद फौज के संस्थापक थे। उनका जन्म 23 जनवरी 1897 को कटक (उड़ीसा) में हुआ। उनके पिता जानकीनाथ बोस एक प्रतिष्ठित वकील थे और माता प्रभावती देवी धार्मिक एवं संस्कारवान महिला थीं।
सुभाष चंद्र बोस बचपन से ही अत्यंत मेधावी, अनुशासित और साहसी थे। उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की तथा उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड जाकर भारतीय सिविल सेवा (ICS) की परीक्षा उत्तीर्ण की। देशसेवा के उद्देश्य से उन्होंने इस प्रतिष्ठित सेवा से त्यागपत्र दे दिया।
वे महात्मा गांधी से प्रभावित थे, किंतु स्वतंत्रता के मार्ग को लेकर उनके विचार भिन्न थे। उन्होंने सशस्त्र संघर्ष का मार्ग अपनाया और आजाद हिंद फौज का नेतृत्व किया। उनका उद्देश्य भारत को शीघ्र स्वतंत्र कराना था। नेताजी का जीवन त्याग, पराक्रम और अदम्य साहस का प्रतीक है। उनका प्रसिद्ध नारा— “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा”— आज भी देशवासियों को प्रेरणा देता है।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस का निधन 18 अगस्त 1945 को माना जाता है। उनका जीवन आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है और राष्ट्रसेवा की भावना को सुदृढ़ करता है।
सुभाष चंद्र बोस और कर्तव्य बोध पखवाड़ा
नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जीवन कर्तव्य बोध, राष्ट्रनिष्ठा और त्याग का अनुपम उदाहरण है। वे मानते थे कि देश की स्वतंत्रता और सम्मान से बढ़कर कोई कर्तव्य नहीं हो सकता। उनका संपूर्ण संघर्ष राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों के निर्वहन को समर्पित था, जो कर्तव्य बोध पखवाड़ा की मूल भावना से पूर्णतः मेल खाता है।
कर्तव्य बोध पखवाड़ा नागरिकों में अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूकता, अनुशासन और सेवा भावना को विकसित करने का अवसर प्रदान करता है। नेताजी का संदेश— “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा”— हमें अपने कर्तव्यों के लिए हर त्याग को स्वीकार करने की प्रेरणा देता है।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आज़ाद हिंद फौज के माध्यम से यह सिद्ध किया कि जब व्यक्ति अपने कर्तव्य को सर्वोपरि मान लेता है, तो असंभव भी संभव हो जाता है। उनका जीवन युवाओं को साहस, आत्मबल और राष्ट्र सेवा का मार्ग दिखाता है।
इस प्रकार कर्तव्य बोध पखवाड़ा नेताजी के आदर्शों को आत्मसात करने का एक सशक्त माध्यम है। उनके विचार हमें प्रेरित करते हैं कि हम अपने व्यक्तिगत, सामाजिक और राष्ट्रीय कर्तव्यों को पूरी निष्ठा और ईमानदारी से निभाएँ।
“यदि हम अपने युवाओं को सही दिशा में शिक्षित करेंगे, तो हमारा देश स्वतंत्रता और प्रगति के पथ पर अग्रसर होगा।”
यह कथन युवाओं और शिक्षा की महत्ता को स्पष्ट करता है। युवा शक्ति किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी होती है। जब युवाओं को सही शिक्षा, नैतिक मूल्य, अनुशासन और कर्तव्य बोध के साथ मार्गदर्शन मिलता है, तब वे केवल अपने भविष्य को ही नहीं, बल्कि देश के भविष्य को भी उज्ज्वल बनाते हैं।
सही दिशा में दी गई शिक्षा युवाओं में आत्मनिर्भरता, राष्ट्रप्रेम और सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास करती है। ऐसे युवा अन्याय के विरुद्ध खड़े होते हैं, नवाचार को अपनाते हैं और देश को प्रगति की ओर ले जाते हैं।
अतः युवाओं की शिक्षा में सही दिशा देना ही सशक्त, स्वतंत्र और विकसित राष्ट्र के निर्माण की कुंजी है।
“शिक्षा प्रणाली ऐसी हो जो छात्रों को न केवल किताबों तक सीमित रखे, बल्कि उन्हें वास्तविक जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार करे।”
यह विचार आधुनिक और सार्थक शिक्षा की आवश्यकता को दर्शाता है। शिक्षा का उद्देश्य केवल पाठ्यक्रम पूरा करना या परीक्षाओं में सफलता प्राप्त करना नहीं है, बल्कि छात्रों में व्यावहारिक ज्ञान, समस्या-समाधान की क्षमता, आत्मविश्वास और निर्णय लेने की शक्ति का विकास करना है।
जब शिक्षा जीवन से जुड़ी होती है, तब विद्यार्थी जिम्मेदार नागरिक बनते हैं। ऐसी शिक्षा उन्हें स्वावलंबी, संवेदनशील और कर्तव्यनिष्ठ बनाती है, जिससे वे समाज और राष्ट्र की उन्नति में सक्रिय भूमिका निभा सकें।
अतः शिक्षा प्रणाली को जीवनोपयोगी, मूल्य आधारित और व्यवहारिक बनाना ही समय की आवश्यकता है।
कर्तव्य बोध पखवाड़ा और शिक्षक के कर्तव्य
शिक्षक कर्तव्य – 1. Quality Education प्रदान करना – बच्चों को अपनी किताबी ज्ञान के आलावा ऐसी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना जिसे वे अपने जीवन में युज करते हुए एक बेहत्तर व्यक्तित्वपूर्ण भविष्य का निर्माण कर सके।
शिक्षक कर्तव्य – 2. Moral development ( नैतिक विकास ) ग्रो करना – हमारा दूसरा कर्तव्य यह है कि छात्रों में शिक्षा के माध्यम से नैतिक विकास होना चाहिए जैसे ईमानदारी ,अपने कार्यो के प्रति उत्तरदायित्व ,एक-दूसरे के प्रति सम्मान ,सहानुभूति ,अनुशासन ,समय प्रबंधन ,समाज और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारियां ,विभिन्न संस्कृतियों ,धर्मो और विचारधाराओं की समझ आदि नैतिक मूल्यों का विकास शिक्षा के माध्यम से होना चाहिए।
शिक्षक कर्तव्य – 3. Timely assessment and guidance ( समय पर मूल्यांकन और मार्गदर्शन ) – समय समय पर छात्रों का प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से मूल्याँकन करते रहना चाहिए ताकि उनकी प्रगति और कमजोरियों को मापा जा सके और जहा सुधार की आवश्यकता हो इसके लिए गाइड किया जा सके।
शिक्षक कर्तव्य – 4. Personal Attention ( व्यक्तिगत ध्यान रखना ) – हमारा यह कर्तव्य है कि हम सभी छात्रों पर व्यक्तिगत ध्यान रखें जब हम बच्चे पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान रखते है तब हमें उसके स्तर का ज्ञान होता है और हम उसी अकॉर्डिंग अपनी योजनाएं निर्धारित करते है।
शिक्षक कर्तव्य – 5. Inspiration for Socity ( समाज के प्रेरणा ) – शिक्षक समाज की रीढ है समाज का बनना और बिगड़ना शिक्षक के ऊपर निर्भर करता है यहाँ हमारा कर्तव्य है कि हम ऐसी छवि ,ऐसा चरित्र समाज के सामने प्रस्तुत करे जिसका समाज अनुसरण करें।
स्वामी विवेकानंद swami vivekanand
सुभाष चंद्र बोस की जीवनी
कर्तव्य बोध